शुक्रवार, 4 मार्च 2011

Sidharth Vyas Astrologer


रात के साये में सिमटा जाता हूं
दिन के उजाले में बिखर जाता हूं
मेरा सपना भी तू हे
मेरी आशा भी तूं हे
मध्यम - मध्यम चल तूं
होठ कंप - कंप गए पर शब्द नहीं गढ़ पाए
मांगने को हुए पर हाथ नहीं बढ़ पाए
दिल धड़कता रहा तेज़
पर बोहों पर शिकन तक ना पड़े
दिल में लाये थे विश्वास भरकर
पर हाथ खाली चले गए
सोच में रात भर जगा हूं में
खोज में शांति के लगा हूं में
काल चक्र के जाल में
फसा हूं में
देह त्याग से ज्यादा कुछ नहीं
क्यूँ की आत्मा से जगा हूं में
आत्मा से जगा हूं में
आचार्य सिद्धार्थ व्या

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