शनिवार, 5 मार्च 2011

आखिर क्यों भूल जाता हूँ ओकात मेरी

अकसर उस पतझड़ के 
जाने के इंतजार में 
सावन के उस अंकुर के 
खिलने की राह में 
     आखिर क्यों   भूल जाता हू ओकात मेरी 
अकसर उस मोहब्बत की  इबाब्त में
घुल जाता हू वक्त की रफ़्तार में 
आखिर क्यों भटक जाता हू 
फिर वही याद आने में 
      आखिर क्यों  भूल जाता हूँ ओकात मेरी 
उस रोते हुए जीगर में 
फ़र्ज कर्तव्य को भूल में 
अपने ही मुल्क़ में 
काफ़िर कहलाया जाता हूँ 
    आखिर क्यूँ  भूल जाता हूँ ओकात मेरी 
जाने अनजाने उस वक़्त की 
तलवार पर चढ़ जाता हूँ 
मुक्कदस की चाह में 
नकाब लगाना भूल जाता हूँ 
    आखिर क्यों भूल जाता हूँ ओकात मेरी 
कागज़ के उस कतरन में 
परिचय लिखना भूल जाता हूँ 
स्याही के उन छिंटो में 
अपना लहू समझ जाता हूँ 
  आखिर क्यों भूल जाता हूँ ओकात मेरी 
               आचार्य सिद्धार्थ व्यास 
                 5-03-2011

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