अकसर उस पतझड़ के
जाने के इंतजार में
सावन के उस अंकुर के
खिलने की राह में
आखिर क्यों भूल जाता हू ओकात मेरी
अकसर उस मोहब्बत की इबाब्त में
घुल जाता हू वक्त की रफ़्तार में
आखिर क्यों भटक जाता हू
फिर वही याद आने में
आखिर क्यों भूल जाता हूँ ओकात मेरी
उस रोते हुए जीगर में
फ़र्ज कर्तव्य को भूल में
अपने ही मुल्क़ में
काफ़िर कहलाया जाता हूँ
आखिर क्यूँ भूल जाता हूँ ओकात मेरी
जाने अनजाने उस वक़्त की
तलवार पर चढ़ जाता हूँ
मुक्कदस की चाह में
नकाब लगाना भूल जाता हूँ
आखिर क्यों भूल जाता हूँ ओकात मेरी
कागज़ के उस कतरन में
परिचय लिखना भूल जाता हूँ
स्याही के उन छिंटो में
अपना लहू समझ जाता हूँ
आखिर क्यों भूल जाता हूँ ओकात मेरी
आचार्य सिद्धार्थ व्यास
5-03-2011
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