गुरुवार, 3 मार्च 2011

जलता कश्मीर

जलता कश्मीर 
बारूद के ढेर पे टिका हे 
डर-डर के साये में  पड़ा हे 
ठन्डे पहाड़ भी आग के 
 साये में सिमटे  हे 
नफरतें मुल्कों की सरहद का राज़ हे 
कोंम भी तो उनके साज़ हे 
सावन का तो ख्वाब नहीं 
पतझड़ का ही  अब सहारा हे 
कलम की ताकत को भुला दिया 
बंदूकों का प्यार बढा दिया 
तख़्त से मोहब्बत हे इतनी उनको 
असला खिला रहे मसूमों को 
परिंदे भी अपने आशियाँ में
किराये पर जेसे रहते हे 
फिरदोश ना अब कहना 
दोज़ख ही अब समझना 
       आचार्य सिद्धार्थ व्यास 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें