शरमाई
शरमाई हो
मेरे तख्बुर की दुनिया सुर्ख हो गई
शायद तुम कंही शरमा गई
इत्र सी महक महक गई
सांसे मेरी
जैसे तुमने जुल्फे बिखराई हो
अधरो पर क्यों अमृत
बरस रहा
शायद तुम मेरा गीत
गुनगुनाई हो
आग सी भर गया
कोई नस नस में
पता नहीं कब तुम
करीब आई हो
कुछ नाम नहीं
इन रिश्तो का
न तुम अपनी
न पराई हो
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