सोमवार, 7 मार्च 2011




ज़िन्दगी का
 हुक्म


ज़िन्दगी हुक्म सुना देती हें,

जो भी जी चाहे सजा देती हें ज़िन्दगी

जिससे उमीद नहीं होती बिलकुल,

बस  वही चीज़ दगा  देती हें ज़िन्दगी,

आँख के आंसू भी नहीं घुलने  पाए,

उससे पहले कुछ और रुला देती हें ज़िन्दगी,

जब भी करता हूँ में कोशिश सभ्लने की,

मेरे कदमो को और लडखडा देती हें ज़िन्दगी,

जब भी चाहा सितारों की तरह चमकना मेने,

मेरे घर का नन्हा दिया भी बुझा देती हें ज़िन्दगी,

 नादाँ दुनिया का दस्तूर पर,

आती हें हंसी मुझको,

हर शाम मुझे रोने की,

वजह देती हें ज़िन्दगी,

मेरी मासूम सी हसरतों,

ना छोड़ो मेरा दामन,

हें कहीं एक धड़कन जो,

जो सदा देती हें ज़िन्दगी,

बस यही एक ख्वाहिश हें,

जीने के लिए थोड़ी

उम्मीद जो दिल में जगा

देती हें ज़िन्दगी,

बस फिर से नया हुक्म सुना देती हें ज़िन्दगी

बस फिर से नया हुक्म सुना देती हें ज़िन्दगी


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