चाँद सितारों से क्या मै पूछूं
कब दिन मेरे फिरते हें
वो तो बेचारे खुद एक दूजे से
डरे - डरे से रोते हें
राग वही पुराना हें
तेरी तो किस्मत खोटी हें
ग़ाव क्या छुटा यारो मेरा
मासूम बचपन छुट गया
नए नगर की लीला न्यारी हें
स्वार्थ की ईमारत पर
सैज बनाये वो बेठे हें
पंछी भी अपने सर पर उठा कर
बसेरे अपने फिरते हें
सोचा था कभी दिल्ली
रिश्तो के नाम पर
असत्य का श्राप होगा
इतिहास के पनों को खंगाला
पांडव कोरवों मुगलों को जब देखा
अंतर आत्मा जाग उठी
देखा हें लोगों को यारो हमने
दामन अपना सी लेते हें
जिसका जेसा मन हो भाई
वैसा ही वो जी लेते हें
वैसा ही वो ...........
आचार्य सिद्धार्थ व्यास

