मंगलवार, 8 मार्च 2011

चाँद सितारों से क्या मै पूछूं

चाँद सितारों से क्या मै पूछूं 

कब  दिन मेरे फिरते हें

वो तो बेचारे खुद एक दूजे से 

डरे - डरे से रोते हें 

राग वही पुराना हें 

तेरी तो किस्मत खोटी हें 

ग़ाव क्या छुटा यारो मेरा 

मासूम बचपन छुट  गया 

नए नगर की लीला न्यारी हें 

स्वार्थ की ईमारत पर 

सैज बनाये वो बेठे हें 

पंछी भी अपने सर पर उठा कर 

बसेरे अपने फिरते हें 

सोचा था कभी  दिल्ली 

रिश्तो  के नाम पर 

असत्य का श्राप होगा 

इतिहास के पनों को खंगाला  

पांडव कोरवों मुगलों को जब देखा 

अंतर आत्मा जाग उठी  

देखा हें लोगों को यारो हमने 

दामन अपना सी  लेते हें 

 जिसका जेसा  मन हो भाई 

वैसा ही वो जी लेते हें 

वैसा ही वो ...........

आचार्य सिद्धार्थ व्यास 

सोमवार, 7 मार्च 2011

बदलती ज़िन्दगी


बदलती ज़िन्दगी 
अपनी राहों से मुल्तलिफ नहीं,
फलक को देख कर,
ज़मी पर परमाद आता हें,
हमें अपने नहीं समझ रहे,
उस खुदा को क्यूँ बोल दूँ .
सिमट गई हें ज़िन्दगी ज़मी की तरह,
मोत बंट गई हें दोलत के लिए,
रूह भी डरती हें ज़मी को छूने के लिए.
फलक पर कुछ और रहने द 

शरमाई शरमाई हो


शरमाई

शरमाई हो

मेरे तख्बुर की दुनिया सुर्ख हो गई

शायद तुम कंही शरमा गई

इत्र सी महक महक गई
सांसे मेरी
जैसे तुमने जुल्फे बिखराई हो
अधरो पर क्यों अमृत
बरस रहा
शायद तुम मेरा गीत
गुनगुनाई हो
आग सी भर गया
कोई नस नस में
पता नहीं कब तुम
करीब आई हो
कुछ नाम नहीं
इन रिश्तो का
न तुम अपनी
न पराई हो

ज़िन्दगी के राज

Sidharth Vyas Astrologer
ज़िन्दगी के राज

आप रुसवा हे
तो में बात कहूँ कैसे
दिल से गर
हुई हे खता
जाने बगैर
में दिल को दूँ
सजा कैसे
साथ चले थे राह्नो में
अ़ब जुदा
रहूँ कैसे
दर्द की
इस लहर को
दिल पर संहु कैसे
ज़िन्दगी के राज
काँधे पे सीर रख के
आया करूँ केसे
टूटे हुवे दिल को
बया करू केसे
प्यार के खिले गुलो को
खुद अपने हाथो से
तबाह करू केसे
अब इन तनहइयो के अँधेरो
दिल का चिराग
रोशन करू केसे
अब ज़िन्दगी के राज
बया करू केसे
बया करू केसे
Koi mousam bhi hum ko raas nahin
woh nahin hay tou kuch bhi paas nahin

aik muddat say dil k paas hay woh
aik muddat say dil udas nahin

jub say daikha hay shaam aankhon mein
tub say meray qayaim hawas nahin

meray lehjay mein us ki khushbo hay
us ki baaton mein meri baas nahin

Jitna Shaffaf hay tera aanchal
Utna ujla mera libaas nahin

samnay meray aik darya hay
hont sokhay hain phir bhi pyas nahin

jis ko chaha hay dil-o-jan say sidharth
janay woh kion nazar shinaas nahin

दिल के दीवारों की, आशिक़ को नसीहत :::---- ( वहदत—एकता )


दिल के दीवारों की, आशिक़ को नसीहत :::---- ( वहदत—एकता )

दिल के दीवारों की, आशिक़ को नसीहत,
इश्क़ के सीमेन्ट से ढह जाये ना छत।
रेत भी गमगीं नदी का हो तो अच्छा,
सुख का दरिया करता है अक्सर बग़ावत।
सब्र का सरिया बिछाना दिल के छत पे,
छड़, हवस की कर न पायेगी हिफ़ाज़त।
प्लास्टर विश्वास के रज का लगा हो,
खिड़कियों के हुस्न से टपके शराफ़त।
सारे दरवाज़े, मिजाज़ों से हों नाज़ुक,
कुर्सियों के बेतों से झलके नफ़ासत।
कमरों में ताला सुकूं का ही जड़ा हो,
फ़र्श लिखता हो मदद की ही इबारत।
दोस्ती की धूप हो,आंगन के लब पे,
गली में महफ़ूज़ हो चश्मे-मुहब्बत।
सीढ़ियों की धोखेबाज़ी, बे-फ़लक हो,
दीन के रंगों से खिलती हो इमारत।
मेहनत का हो धुंआ दानी किचन में,
रोटियों की जंग में, टूटे न वहदत।

काश कभी ऐसा होता


काश कभी ऐसा होता :::------

काश कभी ऐसा होता,
दिल मे जिसकी चाह है ।
उससे ये दिल मिल पाता,
काश कभी ऐसा होता ॥

सूरज की किरणों की तरह,
खिल उठती मेरी भी सुबह ।
फूलों की खूशबू की तरह,
महक उठती मेरी जिन्दगी ॥
काश कभी ऐसा होता.............

पक्षियों की तरह मैं भी अपने
पंख फैला पाती खुले आसमान में ।
कोयल की सुरूली राग की तरह,
अपनी भी दिल की बात सुना पाती किसी को ॥
काश कभी ऐसा होता...................

संघर्षरूपी इस दुनिया मे, मैं भी,
अपने पैरों पर खड़ी हो जाती ।
नाम रौशन अपने घर का
मैं भी कभी कर पाती ॥
काश कभी ऐसा होता.............

जीवन खोने का नही पाने का नाम है,
यह मैं भी समझ जाती ।
आत्मनिर्भर, और सदृढ़, ईमानदार बनकर
, जीवन में आगे बढ़ जाती ॥
काश कभी ऐसा होता...............

हर सूरज की किरण एक नया पैगाम,
देती है, यह समझकर जीवन में,
एक कामयाब इंसान बन पाती ।
काश कभी ऐसा होता ...........

शनिवार, 5 मार्च 2011

आखिर क्यों भूल जाता हूँ ओकात मेरी

अकसर उस पतझड़ के 
जाने के इंतजार में 
सावन के उस अंकुर के 
खिलने की राह में 
     आखिर क्यों   भूल जाता हू ओकात मेरी 
अकसर उस मोहब्बत की  इबाब्त में
घुल जाता हू वक्त की रफ़्तार में 
आखिर क्यों भटक जाता हू 
फिर वही याद आने में 
      आखिर क्यों  भूल जाता हूँ ओकात मेरी 
उस रोते हुए जीगर में 
फ़र्ज कर्तव्य को भूल में 
अपने ही मुल्क़ में 
काफ़िर कहलाया जाता हूँ 
    आखिर क्यूँ  भूल जाता हूँ ओकात मेरी 
जाने अनजाने उस वक़्त की 
तलवार पर चढ़ जाता हूँ 
मुक्कदस की चाह में 
नकाब लगाना भूल जाता हूँ 
    आखिर क्यों भूल जाता हूँ ओकात मेरी 
कागज़ के उस कतरन में 
परिचय लिखना भूल जाता हूँ 
स्याही के उन छिंटो में 
अपना लहू समझ जाता हूँ 
  आखिर क्यों भूल जाता हूँ ओकात मेरी 
               आचार्य सिद्धार्थ व्यास 
                 5-03-2011

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

Sidharth Vyas Astrologer


रात के साये में सिमटा जाता हूं
दिन के उजाले में बिखर जाता हूं
मेरा सपना भी तू हे
मेरी आशा भी तूं हे
मध्यम - मध्यम चल तूं
होठ कंप - कंप गए पर शब्द नहीं गढ़ पाए
मांगने को हुए पर हाथ नहीं बढ़ पाए
दिल धड़कता रहा तेज़
पर बोहों पर शिकन तक ना पड़े
दिल में लाये थे विश्वास भरकर
पर हाथ खाली चले गए
सोच में रात भर जगा हूं में
खोज में शांति के लगा हूं में
काल चक्र के जाल में
फसा हूं में
देह त्याग से ज्यादा कुछ नहीं
क्यूँ की आत्मा से जगा हूं में
आत्मा से जगा हूं में
आचार्य सिद्धार्थ व्या

पिता की नेतिक पुकार


29-09-1996 ( 27 birthday )
    पिता की नेतिक  पुकार



दसरथ जैसा पिता लेकिन
शर्त राम सा वनवासी होगा
पिता अवश्य हूँ लेकिन
ध्र्तराष्ट्र सा मोहान्ध नहीं
कर्तव्य बोध से निर्वहन से परिचित
सोद्र्श्य वैभव में लिप्त किन्तु
 कृष्ण सरीखा में कलयुग का
सोपान लिए
देखा हे भविष्य बेचते हो अकसर
हंसी खरीदते हो अकसर
तुम्हारी मुश्कान कहाँ खोई हे
जेसे ढंडी रात सोई हे
जब जन्म लिया तुमने अचानक
में तब भी महज़  एक बच्चा था
अर्सा बीता जीवन छीना छन - छन
फिर भी विश्वास सर्वत्र अच्छा था
उम्र बदली अहसास बदल गए
यह कायनात तुम्हारी झोली में
कब से भूली अटकी हे
थोडा सा अहसास जगादो
यह मज़बूर बाप की मर्ज़ी हे
 यह मज़बूर बाप की मर्ज़ी हे ,,,,,,,,,,,
.............................
     डॉ . उमा शंकर व्यास

गुरुवार, 3 मार्च 2011

जलता कश्मीर

जलता कश्मीर 
बारूद के ढेर पे टिका हे 
डर-डर के साये में  पड़ा हे 
ठन्डे पहाड़ भी आग के 
 साये में सिमटे  हे 
नफरतें मुल्कों की सरहद का राज़ हे 
कोंम भी तो उनके साज़ हे 
सावन का तो ख्वाब नहीं 
पतझड़ का ही  अब सहारा हे 
कलम की ताकत को भुला दिया 
बंदूकों का प्यार बढा दिया 
तख़्त से मोहब्बत हे इतनी उनको 
असला खिला रहे मसूमों को 
परिंदे भी अपने आशियाँ में
किराये पर जेसे रहते हे 
फिरदोश ना अब कहना 
दोज़ख ही अब समझना 
       आचार्य सिद्धार्थ व्यास