सोमवार, 11 अप्रैल 2011

वक़्त परिंदा


वक़्त परिंदा बन गया !
उड़ने के लिए !!
उम्र भी कट रही पतझड़ की तरह !
इंतजार हें शायद उसको सावन के लिए !!
एकलव्य जेसा शिष्य हूँ !
पर द्रोण बना हें अर्जुन के लिए !!
वक़्त परिंदा बन गया !
उड़ने के लिए !!
धफ्न कर दिया ज़मीर मेने !
ना जाने क्यों औरो के लिए !!
वक़्त परिंदा बन गया !
उड़ने के लिए !!
कब मकबूल होगी हशरत मेरी !
खफा हूँ ख़ुदा मै तेरे से किस के लिए !!
वक़्त परिंदा बन गया !
उड़ने के लिए !!
टूट रही हें ज़िन्दगी !
उस दौलत के लिए !!
फरामोश हो गये वो !
क्यों उस कनीज़ के लिए !!
वक़्त परिंदा बन गया !
उड़ने के लिए !!
ह्लक मै आवाज रुक गई डर से !
बिखर ना जाये मोती कहीं
उस धागे के लिए !!
वक़्त परिंदा बन गया !
उड़ने के लिए !!
जानत देखना चाहता हर कोई !
कबूल करना मुश्किल हें मौत के लिए !!
वक़्त परिंदा बन गया !
उड़ने के लिए !!
जनक गुरु ने देख बता दिया !
देह नहीं रूकावट ख़ुदा को पाने के लिए !!
वक़्त परिंदा बन गया !उड़ने के लिए !!

आचार्य सिद्धार्थ व्यास

1 टिप्पणी: